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Bhasha ke kitne roop hote hain ( भाषा के रूप, प्रकार )

Bhasha ( भाषा ) :- भाषा को प्राचीन काल से ही परिभाषित करने की कोशिश की जाती रही है। इसकी कुछ मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

  • (1) ‘भाषा’ शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाए।
  • (2) प्लेटो ने सोफिस्ट में विचार और भाषा के सम्बन्ध में लिखते हुए कहा है कि विचार और भाषा में थोड़ा ही अंतर है। विचार आत्मा की मूक या अध्वन्यात्मक बातचीत है और वही शब्द जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो उसे भाषा की संज्ञा देते हैं।
  • (3) स्वीट के अनुसार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।
  • (4) वेन्द्रीय कहते हैं कि भाषा एक तरह का चिह्न है। चिह्न से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपना विचार दूसरों के समक्ष प्रकट करता है। ये प्रतीक कई प्रकार के होते हैं जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्र ग्राह्य और स्पर्श ग्राह्य। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।
  • (5) ब्लाक तथा ट्रेगर– भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तन्त्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह सहयोग करता है।
  • (6) स्त्रुत्वा – भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतीकों का तन्त्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग एवं समृपर्क करते हैं।
  • (7) इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका – भाषा को यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तन्त्र है जिसके द्वारा मानव प्राणि एक सामाजिक समूह के सदस्य और सांस्कृतिक साझीदार के रूप में एक सामाजिक समूह के सदस्य संपर्क एवं सम्प्रेषण करते हैं।
  • (8) ए. एच. गार्डिबर का मन्तव्य है-“The common definition of speech is the use of articulate sound symbols for the expression of thought.” अर्थात् विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त एवं स्पष्ट भ्वनि-संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उनके समूह को भाषा कहते हैं।
  • (9) ‘‘भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव परम्परा विचारों का आदान-प्रदान करता है।’’ स्पष्ट ही इस कथन में भाषा के लिए चार बातों पर ध्यान दिया गया है-
(1) भाषा एक पद्धति है, यानी एक सुसम्बद्ध और सुव्यवस्थित योजना या संघटन है, जिसमें कर्ता, कर्म, क्रिया, आदि व्यवस्थिति रूप में आ सकते हैं।
(2) भाषा संकेतात्कम है अर्थात् इसमे जो ध्वनियाँ उच्चारित होती हैं, उनका किसी वस्तु या कार्य से सम्बन्ध होता है। ये ध्वनियाँ संकेतात्मक या प्रतीकात्मक होती हैं।
(3) भाषा वाचिक ध्वनि-संकेत है, अर्थात् मनुष्य अपनी वागिन्द्रिय की सहायता से संकेतों का उच्चारण करता है, वे ही भाषा के अन्तर्गत आते हैं।
(4) भाषा यादृच्छिक संकेत है। यादृच्छिक से तात्पर्य है – ऐच्छिक, अर्थात् किसी भी विशेष ध्वनि का किसी विशेष अर्थ से मौलिक अथवा दार्शनिक सम्बन्ध नहीं होता। प्रत्येक भाषा में किसी विशेष ध्वनि को किसी विशेष अर्थ का वाचक ‘मान लिया जाता’ है। फिर वह उसी अर्थ के लिए रूढ़ हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि वह परम्परानुसार उसी अर्थ का वाचक हो जाता है। दूसरी भाषा में उस अर्थ का वाचक कोई दूसरा शब्द होगा।

हम व्यवहार में यह देखते हैं कि भाषा का सम्बन्ध एक व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण विश्व तक है। व्यक्ति और समाज के बीच व्यवहार में आने वाली इस परम्परा से अर्जित सम्पत्ति के अनेक रूप हैं। समाज सापेक्षता भाषा के लिए अनिवार्य है, ठीक वैसे ही जैसे व्यक्ति सापेक्षता। भाषा संकेतात्मक होती है अर्थात् वह एक ‘प्रतीक-स्थिति’ है। इसकी प्रतीकात्मक गतिविधि के चार प्रमुख संयोजक हैः दो व्यक्ति-एक वह जो संबोधित करता है, दूसरा वह जिसे संबोधित किया जाता है, तीसरी संकेतित वस्तु और चौथी-प्रतीकात्मक संवाहक जो संकेतित वस्तु की ओर प्रतिनिधि भंगिमा के साथ संकेत करता है।

विकास की प्रक्रिया में भाषा का दायरा भी बढ़ता जाता है। यही नहीं एक समाज में एक जैसी भाषा बोलने वाले व्यक्तियों का बोलने का ढंग, उनकी उच्चारण-प्रक्रिया, शब्द-भण्डार, वाक्य-विन्यास आदि अलग-अलग हो जाने से उनकी भाषा में पर्याप्त अन्तर आ जाता है। इसी को शैली कह सकते हैं।भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में- जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है। सार्थक शब्दों के समूह या संकेत को भाषा कहते है।

यह संकेत स्पष्ट होना चाहिए। मनुष्य के जटिल मनोभावों को भाषा व्यक्त करती है; किन्तु केवल संकेत भाषा नहीं है। रेलगाड़ी का गार्ड हरी झण्डी दिखाकर यह भाव व्यक्त करता है कि गाड़ी अब खुलनेवाली है; किन्तु भाषा में इस प्रकार के संकेत का महत्त्व नहीं है। सभी संकेतों को सभी लोग ठीक-ठीक समझ भी नहीं पाते और न इनसे विचार ही सही-सही व्यक्त हो पाते हैं। सारांश यह है कि भाषा को सार्थक और स्पष्ट होना चाहिए।

Bhasha ke kitne roop hote hain ( भाषा के रूप, प्रकार )

Bhasha ke kitne roop hote hain ( भाषा के रूप, प्रकार )

भारत की भाषाएँ

भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 22 है। 1950 में भारतीय संविधान की स्थापना के समय में, मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 14 थी।

आठवीं अनुसूची में तदोपरान्त जोड़ी गई भाषाएँ सिन्धी, कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी, मैथिली, डोगरी, बोडो और सन्थाली सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यांवयन (कार्यान्वयन) मन्त्रालय की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार पहचान योग्य मातृभाषाओं की संख्या 234 है।

शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने वाली पहली भाषा तमिल शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने वाली अन्य भाषाएँ संस्कृत, कन्नड़, मलयालम, तेलुगू  और उड़िया नागालैंड की राजभाषा है अंग्रेजी, जम्मू और कश्मीर की राजभाषा उर्दू, गोवा की राजभाषा कोंकणी है। भारत के संविधान द्वारा निर्धारित सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की राजभाषा अंग्रेजी है।

लक्षद्वीप की प्रमुख भाषाएँ जेसरी (द्वीप भाषा) और महल सामान्यतः पुडुचेरी (पूर्व में पांडिचेरी) में बोली जाने वाली विदेशी भाषा फ्रेंच ‘पूर्व की इतालवी’ कही जाने वाली भारतीय भाषा तेलुगु भारत का एकमात्र राज्य जहाँ संस्कृत राजभाषा मे रूप में मान्य है उत्तराखण्ड अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह के प्रमुख भाषाएँ हिन्दी, निकोबारी, बंगाली, तमिल, मलयालम और तेलुगू। अंग्रेजी मान्यता प्राप्त भाषाओं की सूची में नहीं है।

  • जम्मू एवं कश्मीर में कश्मीरी डोगरी और हिन्दी है।
  • हिमाचल प्रदेश में हिन्दी पंजाबी और नेपाली है।
  • हरियाणा में हिन्दी, पंजाबी और उर्दू है।
  • पंजाब में पंजाबी व हिन्दी है।
  • उत्तराखण्ड में हिन्दी उर्दू, पंजाबी और नेपाली है।
  • दिल्ली में हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और बंगाली है।

उत्तर प्रदेश में हिन्दी व उर्दू है।

  • राजस्थान में हिन्दी, पंजाबी और उर्दू है।
  • मध्य प्रदेश में हिन्दी,मराठी और उर्दू है।
  • पश्चिम बंगाल बंगाली हिन्दी, संताली, उर्दू, नेपाली है।
  • छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी व हिन्दी है।
  • बिहार में हिन्दी, मैथिली और उर्दू हैं।
  • झारखण्ड में हिन्दी, संताली, बंगाली और उर्दू है।
  • सिक्किम में नेपाली, हिन्दी, बंगाली है।
  • अरुणाचल प्रदेश में बंगाली, नेपाली, हिन्दी और असमिया है।
  • नागालैण्ड में बंगाली हिन्दी और नेपाली है।
  • मिजोरम में बंगाली हिन्दी और नेपाली है।
  • असम में असमिया बंगाली, हिन्दी, बोडो और नेपाली है।
  • त्रिपुरा में बंगाली व हिन्दी है।
  • मेघालय में बंगाली, हिन्दी और नेपाली है।
  • मणिपुर में मणिपुरी, नेपाली, हिन्दी और बंगाली है।
  • ओडिशा में ओड़िया हिन्दी, तेलुगु और संताली है।
  • महाराष्ट्र में मराठी, हिन्दी, उर्दू और गुजराती है।
  • गुजरात में गुजराती, हिन्दी, सिन्धी, मराठी और उर्दू है।
  • कर्नाटक में कन्नड़ उर्दू, तेलुगू, मराठी और तमिल है।
  • दमन और दीव में गुजराती हिन्दी और मराठी है।
  • दादरा और नगर हवेली में गुजराती, हिन्दी, कोंकणी और मराठी है।
  • गोवा में कोंकणी मराठी, हिन्दी और कन्नड़ है।
  • आन्ध्र प्रदेश में तेलुगु उर्दू, हिन्दी और तमिल है।
  • केरल में मलयालम है।
  • लक्षद्वीप में मलयालम है।
  • तमिलनाडु में तमिल तेलुगू, कन्नड़ और उर्दू‌ है।
  • पुडुचेरी में तमिल तेलुगू, कन्नड़ और उर्दू है।
  • अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह में बंगाली, हिन्दी, तमिल, तेलुगू और मलयालम है।

Bhasha ke kitne roop hote hain (भाषा के रूप)

भाषा के प्रकार भाषा के तीन रूप होते है-

(1)मौखिक भाषा

(2)लिखित भाषा

(3)सांकेतिक भाषा

(1)मौखिक भाषा:- विद्यालय में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में वक्ताओं ने बोलकर अपने विचार प्रकट किए तथा श्रोताओं ने सुनकर उनका आनंद उठाया। यह भाषा का मौखिक रूप है। इसमें वक्ता बोलकर अपनी बात कहता है व श्रोता सुनकर उसकी बात समझता है। इस प्रकार, भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति बोलकर विचार प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति सुनकर उसे समझता है, मौखिक भाषा कहलाती है। दूसरे शब्दों में- जिस ध्वनि का उच्चारण करके या बोलकर हम अपनी बात दुसरो को समझाते है, उसे मौखिक भाषा कहते है। 

उदाहरण: टेलीफ़ोन, दूरदर्शन, भाषण, वार्तालाप, नाटक, रेडियो आदि। यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। मनुष्य ने पहले बोलना सीखा। इस रूप का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है।

(2)लिखित भाषा:- मुकेश छात्रावास में रहता है। उसने पत्र लिखकर अपने माता-पिता को अपनी कुशलता व आवश्यकताओं की जानकारी दी। माता-पिता ने पत्र पढ़कर जानकारी प्राप्त की। यह भाषा का लिखित रूप है। इसमें एक व्यक्ति लिखकर विचार या भाव प्रकट करता है, दूसरा पढ़कर उसे समझता है। इस प्रकार भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति अपने विचार या मन के भाव लिखकर प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति पढ़कर उसकी बात समझता है, लिखित भाषा कहलाती है। दूसरे शब्दों में- जिन अक्षरों या चिन्हों की सहायता से हम अपने मन के विचारो को लिखकर प्रकट करते है, उसे लिखित भाषा कहते है।

उदाहरण:पत्र, लेख, पत्रिका, समाचार-पत्र, कहानी, जीवनी, संस्मरण, तार आदि।

(3)सांकेतिक भाषा :- जिन संकेतो के द्वारा बच्चे या गूँगे अपनी बात दूसरों को समझाते है, वे सब सांकेतिक भाषा कहलाती है। दूसरे शब्दों में- जब संकेतों (इशारों) द्वारा बात समझाई और समझी जाती है, तब वह सांकेतिक भाषा कहलाती है।

उदाहरण– चौराहे पर खड़ा यातायात नियंत्रित करता सिपाही, मूक-बधिर व्यक्तियों का वार्तालाप आदि। इसका अध्ययन व्याकरण में नहीं किया जाता। पंजाब मे पाठ 1 भाषा आर लिपि।

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